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सज्जन कुमार की मौत के बाद 1984 दंगों के पीड़ितों में मिली-जुली प्रतिक्रिया
42 साल से न्याय का इंतजार कर रहे पीड़ित परिवारों के लिए सज्जन कुमार की मृत्यु एक अध्याय बंद करती है। कुछ को राहत महसूस हुई जबकि अन्य का मानना है कि वह अपने अपराधों की सजा से बच गए।
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1984 के सिख विरोधी दंगों में अपने प्रियजनों को खो चुके परिवारों ने सज्जन कुमार की मौत पर विविध प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। जिन लोगों ने हिंसा के क्षणों को सीधे देखा था, उन्होंने याद दिलाया कि उन दिनों चारों ओर आग ही आग थी। दिल्ली में हुए सांप्रदायिक हिंसा के इस भीषण दौर में कई लोग मारे गए और हजारों विस्थापित हुए।
सज्जन कुमार की मृत्यु से पीड़ितों के लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई का निष्कर्ष आया है। कुछ पीड़ित परिवारों ने इस विकास से राहत व्यक्त की है, जबकि अन्य यह भी कहते हैं कि उन्हें न्याय मिलने से पहले ही वह जीवन से मुक्त हो गए। उनका कहना है कि अपनी गतिविधियों के लिए उन्हें अंतिम और कठोरतम सजा मिलनी चाहिए थी।
चार दशक से अधिक समय तक न्याय के लिए प्रतीक्षा करने वाले परिवारों के लिए यह क्षण विभिन्न भावनाओं को उजागर करता है। जहां कुछ को यह लगता है कि न्याय व्यवस्था में कोई समापन हुआ है, वहीं अन्य का विचार है कि असली न्याय के बिना घाव भरना मुश्किल है। 1984 की त्रासदी के निशान भारत के समाज में आज भी गहरे हैं।