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नोटबंदी के दस साल बाद: सीमित लाभ का सबूत मिल रहा है
नोटबंदी का प्रमुख लक्ष्य नकदी प्रचलन में स्थायी कमी लाना विफल रहा है। अर्थव्यवस्था को गंभीर व्यवधान का सामना करना पड़ा, जबकि काली कमाई के पता चलने के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिल सके।
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नोटबंदी के एक दशक बाद का विश्लेषण दर्शाता है कि इस आर्थिक निर्णय के व्यापक दावों के विपरीत ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं। 2016 में लागू की गई इस नीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था से अवैध धन को समाप्त करना और नकदी के उपयोग को कम करना था, लेकिन दोनों ही क्षेत्रों में स्थायी प्रभाव देखने को नहीं मिला है।
नकदी प्रचलन के आंकड़े विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। प्रारंभिक कम वर्षों के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी का संचलन पूर्व स्तरों पर लौट आया है। छोटे व्यापार, कृषि और असंगठित क्षेत्र में नकदी लेनदेन में कोई दीर्घकालिक परिवर्तन नहीं आया है।
काली कमाई के संबंध में भी नोटबंदी के प्रभाव सीमित दिख रहे हैं। इस कार्रवाई के माध्यम से अवैध धन के बड़े भंडार सामने आने की अपेक्षा की गई थी, किंतु वास्तविक परिणाम उम्मीदों से कहीं कम रहे।
दूसरी ओर, नोटबंदी के कारण व्यापारियों, किसानों और सामान्य नागरिकों को व्यापक कठिनाई का सामना करना पड़ा था। छोटे व्यवसायों की आर्थिकी प्रभावित हुई, रोजमर्रा की खरीद-बिक्री में व्यवधान आया और अनौपचारिक क्षेत्र को गंभीर झटका लगा। ये प्रभाव अल्पकालिक ही नहीं रहे, बल्कि कई क्षेत्रों में दीर्घ अवधि तक महसूस किए गए।
इस दशकीय मूल्यांकन से स्पष्ट होता है कि नोटबंदी की नीति अपने मुख्य उद्देश्यों में सफल नहीं रही, जबकि इससे जुड़ी सामाजिक-आर्थिक कीमत काफी अधिक रही है।