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नोटबंदी के दशक बाद भी नकदी और डिजिटल भुगतान का विरोधाभास बरकरार

दस साल पहले की नोटबंदी के बाद डिजिटल लेनदेन में तेजी आई है, लेकिन नकदी फिर से बाजार में लौट आई है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था में एक जटिल स्थिति सामने आई है।

LSN India · 8 November 2026

नोटबंदी के दशक बाद भी नकदी और डिजिटल भुगतान का विरोधाभास बरकरार

नवंबर 2016 में किए गए नोटबंदी के निर्णय के दस साल बाद भी भारत की मुद्रा प्रणाली में एक अहम विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक ओर जहां स्मार्टफोन और इंटरनेट के विस्तार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर नकदी का प्रचलन पुनः बढ़ गया है।

पिछले दशक में यूपीआई, डिजिटल वॉलेट और ऑनलाइन बैंकिंग सेवाओं का उपयोग काफी हद तक बढ़ा है। शहरी क्षेत्रों में तो डिजिटल लेनदेन की प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई दी है। हालांकि, ग्रामीण भारत और असंगठित क्षेत्र में अभी भी नकदी का उपयोग प्रमुख बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत की विविध आर्थिक संरचना को दर्शाती है। डिजिटल भुगतान की सुविधा के बावजूद, बड़ी आबादी अभी भी पारंपरिक नकदी लेनदेन पर निर्भर है। इंटरनेट कनेक्टिविटी की सीमाएं और डिजिटल साक्षरता की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।

रिजर्व बैंक के आंकड़े दिखाते हैं कि नोटबंदी के बाद नकदी की मांग में क्रमिक वृद्धि हुई है। यह भारत की अर्थव्यवस्था में दोहरी प्रणाली के सह-अस्तित्व को दर्शाता है, जहां डिजिटल और नकद दोनों ही लेनदेन समानांतर रूप से चलते रहते हैं। अगले वर्षों में यह संतुलन कैसे विकसित होगा, यह भारत की आर्थिक नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है।