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प्राचीन माया सभ्यता के मंदिरों में इस्तेमाल रंग ने झीलों को पारा से प्रदूषित किया

भारतीय पुरातत्व अध्ययन के समान, माया सभ्यता द्वारा मंदिरों को सजाने के लिए पारा-युक्त सिंदूर का उपयोग सदियों तक झीलों और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदूषित करता रहा। शोध से पता चलता है कि इस प्रदूषण का जलीय जीवन और मानव स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

LSN India · 8 November 2026

प्राचीन माया सभ्यता के मंदिरों में इस्तेमाल रंग ने झीलों को पारा से प्रदूषित किया

प्राचीन माया सभ्यता धार्मिक अनुष्ठानों और सजावट के लिए एक लाल रंग का उपयोग करती थी जो पारा-समृद्ध सिंदूर से बना था। यह खनिज-आधारित रंग मंदिरों और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं को रंगने में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था, लेकिन इसके गंभीर पर्यावरणीय परिणाम थे।

नई शोध से संकेत मिलता है कि इस प्रथा के कारण निकटवर्ती झीलों और जल स्रोतों में पारे का महत्वपूर्ण संचय हुआ। समय के साथ, पर्यावरण में पारे का संचय बढ़ता गया और यह खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर गया, जिससे जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि झीलों में बढ़ता पारे का स्तर न केवल मछलियों और अन्य जलीय जीवों को प्रभावित करता था, बल्कि यह इन जल स्रोतों पर निर्भर रहने वाली मानव आबादी के स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा बन गया होगा।

विभिन्न माया पुरातत्व स्थलों पर समान प्रदूषण के प्रमाण पाए गए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह पर्यावरणीय प्रभाव माया क्षेत्र में व्यापक रहा होगा। यह खोज प्राचीन सभ्यताओं के सांस्कृतिक प्रथाओं और उनके दीर्घकालीन पारिस्थितिक परिणामों के बीच जटिल संबंध को उजागर करती है।