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भाजपा के अनुसूचित जाति/जनजाति सांसदों ने कम बहस में भाग लिया
18वीं लोकसभा में भाजपा के 46 अनुसूचित जाति और जनजाति से चुने गए सदस्य औसतन 13.9 बहसों में भाग लेते रहे, जबकि सदन का औसत 21.5 और भाजपा के अन्य सांसद 19.7 बहसों में शामिल हुए।
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भाजपा के अनुसूचित जाति और जनजाति सीटों से निर्वाचित सांसदों की सदन में सक्रियता पर एक विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि ये सदस्य लोकसभा में होने वाली बहस-मुबाहिसों में अपने समकक्षों की तुलना में काफी कम भाग ले रहे हैं। संसद के राष्ट्रीय अनुसंधान सेवा के आंकड़ों के अनुसार, 18वीं लोकसभा में भाजपा की 46 अनुसूचित जाति और जनजाति प्रतिनिधि औसतन 13.9 बहसों में शामिल हुए।
यह आंकड़ा लोकसभा के कुल औसत 21.5 बहसों से काफी पीछे है। भाजपा के अन्य सांसदों की तुलना में भी यह संख्या कमजोर है, जिन्होंने औसतन 19.7 बहसों में भाग लिया है। यह अंतर संसदीय प्रतिनिधित्व के प्रश्न को रेखांकित करता है।
संसदीय कार्यप्रणाली में बहस और चर्चा में भाग लेना किसी सांसद की सक्रियता का महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है। ऐसे में अनुसूचित जाति और जनजाति प्रतिनिधियों का इस क्षेत्र में कम प्रदर्शन आश्चर्य का विषय है।
विश्लेषकों के अनुसार, सदन में भाग लेने की यह प्रवृत्ति अल्पसंख्यक समुदायों और हाशिए के समाज के मुद्दों को लेकर प्रतिनिधित्व के स्तर को प्रभावित करती है। लोकसभा में प्रश्नकाल और विचार-विमर्श के माध्यम से जनहित के मामलों को उठाना एक संसद सदस्य का प्राथमिक कर्तव्य माना जाता है।