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बंधुआ मजदूरी कानून के पचास साल बाद भी बरकरार है: न्यायाधीश
एक न्यायाधीश ने कहा है कि संविधान द्वारा गारंटीकृत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। बंधुआ मजदूरी कानून पचास साल बाद भी देश में प्रचलित है।
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भारत में बंधुआ मजदूरी की कुरीति अब भी जड़ें जमाए हुए है, हालांकि इसे समाप्त करने के लिए कानून बने हुए हैं। एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने इस गंभीर सामाजिक समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बंधुआ मजदूरी निषेध कानून बने पचास साल बीत चुके हैं, फिर भी इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सका है।
न्यायाधीश के अनुसार, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में लाखों लोग अभी भी बंधुआ मजदूरी की व्यवस्था में फंसे हुए हैं। यह संवैधानिक गारंटी को सार्थक बनाने में एक बड़ी बाधा है।
न्यायाधीश ने कहा है कि इस समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए सरकार को अधिक सक्रिय और प्रतिबद्ध होना होगा। न केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके कार्यान्वयन पर भी समान ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बंधुआ मजदूरी की समस्या मुख्यतः गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता से जुड़ी है। इसे दूर करने के लिए शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।