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किताबों पर प्रतिबंध लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक: ओमर अब्दुल्ला
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने कहा है कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों को चुनौती देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में निर्वाचित सरकारों को इस तरह के निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
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जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेता ओमर अब्दुल्ला ने पुस्तकों पर प्रतिबंध के मुद्दे को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में साहित्य पर प्रतिबंध लगाना मौलिक सिद्धांतों के विरुद्ध है और इससे जनता के बौद्धिक विकास में बाधा आती है।
अब्दुल्ला के अनुसार, ऐसे संवेदनशील मामलों में केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही निर्णय नहीं लेना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि किताबों पर प्रतिबंध का निर्णय व्यापक सामाजिक और संवैधानिक परामर्श के माध्यम से ही लिया जाना चाहिए। यह मामला केवल सरकारी फरमानों से परे है।
नेता का मानना है कि प्रकाशन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला है। जब सरकारें साहित्य पर नियंत्रण करने की कोशिश करती हैं, तो यह समाज के विकास में बाधा डालता है और नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन करता है।
अब्दुल्ला ने सभी हितधारकों से इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श करने का आह्वान किया है। उनके विचार से, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।