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शांतिपूर्ण प्रदर्शन को 'शांति भंग' बताकर गिरफ्तारी का षड्यंत्र: याचिका
सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि अगर हर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को सत्ता द्वारा शांति भंग माना जाएगा, तो नागरिकों को सार्वजनिक प्रदर्शन का मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो जाएगा।
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विद्वान और शिक्षाविद अपूर्वानंद झा ने सर्वोच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने तर्क दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को 'शांति भंग' का आरोप लगाकर नागरिकों को गिरफ्तार करना एक सुनियोजित षड्यंत्र है।
झा के अनुसार, जब भी कोई शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया जाता है, तो सत्ता इसे शांति भंग की श्रेणी में डालकर कार्रवाई करती है। यह प्रणाली नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने का माध्यम बन गई है।
याचिका में कहा गया है कि अगर इसी तरीके से हर शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाया जाता रहा, तो भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त लोकतांत्रिक अधिकार व्यावहारिक रूप से समाप्त हो जाएंगे।
यह मामला संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक प्रदर्शन के अधिकार से संबंधित है। सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा की जा रही है कि वह इन अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे।