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कार्बन ऋण और जीवाश्म ईंधन: COP31 में BRICS का रुख
विकासशील देशों के BRICS समूह ने जलवायु वार्ताओं में जीवाश्म ईंधन को लेकर अपना विशिष्ट立ष्टिकोण प्रस्तुत किया है। कार्बन ऋण की अवधारणा इस मतभेद के मूल में है।
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BRICS समूह की ओर से COP31 में उठाया गया सवाल विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु न्याय को लेकर गहरी खाई को उजागर करता है। पिछली शताब्दी में औद्योगीकरण के दौरान विकसित राष्ट्रों द्वारा किए गए कार्बन उत्सर्जन के लिए कार्बन ऋण की अवधारणा उन्हें जिम्मेदार ठहराती है।
भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों का तर्क है कि उन्हें विकास के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इन देशों का कहना है कि ऐतिहासिक उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकसित पश्चिमी देशों पर है, जिन्होंने अपनी औद्योगिक प्रगति के लिए सदियों तक जीवाश्म ईंधन का दोहन किया। इसलिए BRICS राष्ट्र न्यायसंगत संक्रमण की बात करते हैं जो विकास को बाधित न करे।
जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की वैश्विक रणनीति में BRICS का यह रुख मायने रखता है क्योंकि ये देश वैश्विक आबादी का आधा और विश्व अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा प्रतिनिधित्व करते हैं। जलवायु वार्ताओं में इनकी सहमति के बिना कोई वास्तविक प्रगति संभव नहीं लगती।
COP31 में यह बहस सामने आना दर्शाता है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल तकनीकी समाधान काफी नहीं हैं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय के प्रश्नों को भी संबोधित करना होगा। विकसित देशों को विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के संक्रमण में आर्थिक समर्थन बढ़ाना होगा ताकि एक सर्वमान्य समाधान निकल सके।