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बौद्ध दर्शन में मिलता है प्रतिशोध की भावना से मुक्ति का रास्ता

गौतम बुद्ध की शिक्षाएं बताती हैं कि बदले की चाहत मनुष्य को आंतरिक शांति से दूर रखती है। उनके अनुसार क्षमा और करुणा ही जीवन में वास्तविक सुख का मार्ग है।

LSN India · 21 August 2026

बौद्ध दर्शन में मिलता है प्रतिशोध की भावना से मुक्ति का रास्ता

बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में प्रतिशोध की भावना को मानव दुःख का प्रमुख कारण बताया है। उनका मानना था कि जब कोई व्यक्ति बदला लेने का सपना देखता है, तो वह वास्तव में अपने ही मन को जहर से भर देता है। बुद्ध के दर्शन में क्रोध और प्रतिहिंसा दोनों ही आत्मविनाशक भावनाएं मानी जाती हैं जो मनुष्य को आंतरिक शांति से वंचित रखती हैं।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिशोध की भावना में जकड़ा रहता है, वह स्वयं को यातना देता है। बुद्ध ने सिखाया कि नकारात्मक विचारों को पोषण देने से चित्त की शुद्धि असंभव हो जाती है। इसलिए उन्होंने करुणा, क्षमा और अहिंसा को मानवीय विकास का आधार माना।

बुद्ध की शिक्षा यह है कि दूसरे के कर्मों के लिए स्वयं को पीड़ा देना मूर्खता है। जब हम किसी को क्षमा कर देते हैं, तो हम अपने मन से बोझ हल्का करते हैं और मानसिक शांति प्राप्त करते हैं। यही शिक्षा आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में भी प्रासंगिक बनी हुई है।

बौद्ध दर्शन में विश्वास है कि प्रत्येक कार्य के परिणाम होते हैं, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। जो व्यक्ति दूसरों को हानि पहुंचाता है, उसे अंतत: स्वयं भी पीड़ा झेलनी पड़ती है। इसलिए बदले की कार्रवाई न करके यदि हम क्षमा का मार्ग अपनाते हैं, तो हम न केवल अपनी मानसिक शांति बनाए रखते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी बढ़ावा देते हैं।