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चुनाव आयोग में CEC की सर्वोच्च शक्ति नहीं: संविधान क्या कहता है
चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी राय अंतिम नहीं होती। संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर जोर देते हैं।
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भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अन्य आयुक्तों की असहमति को खारिज करने की शक्ति है। संविधान के प्रावधान और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों में इसका स्पष्ट उत्तर मिलता है।
चुनाव आयोग के कामकाज का आधार 'फर्स्ट अमंग इकुअल' (समानों में प्रथम) का सिद्धांत है। इसका अर्थ यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष तो हैं, परंतु वह अकेले शक्ति नहीं रखते। चुनाव आयोग के समस्त प्रमुख निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के माध्यम से लिए जाते हैं।
जब आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो बहुमत का सिद्धांत लागू होता है। इसका अर्थ यह है कि यदि दोनों आयुक्त किसी निर्णय पर असहमत हों, तो मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले अपनी राय को अंतिम रूप नहीं दे सकते। बहुमत से जो निर्णय बनता है, वही आयोग का निर्णय माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि चुनाव आयोग का कामकाज पारदर्शिता और सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर आधारित है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी एक व्यक्ति की निरंकुश शक्ति न हो और लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण हो।