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विदेशों में भी दलितों का भेदभाव, प्रवासी भारतीय समुदाय ले गया जातिगत पूर्वाग्रह
विदेश में पढ़ाई करने वाले दलित छात्र जातिगत भेदभाव से मुक्ति की उम्मीद लगाते हैं, लेकिन प्रभावशाली जातियों के प्रवासी समुदाय ने अपने पूर्वाग्रहों को कक्षाओं और सामाजिक दायरों तक पहुंचा दिया है।
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भारतीय दलित छात्र जब अपनी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं तो वे अक्सर समझते हैं कि वे जातिगत भेदभाव की परंपरागत व्यवस्था से दूर हो जाएंगे। हालांकि, भारतीय प्रवासी समुदायों में सक्रिय शिक्षा केंद्रों और सामाजिक समूहों में दलित छात्रों को यह अहसास होता है कि जातिगत पूर्वाग्रह सीमाओं को पार कर गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों के परिसरों में और प्रवासी भारतीय नेटवर्क के माध्यम से वर्णव्यवस्था के आधार पर होने वाले भेदभाव की घटनाएं सामने आई हैं। कक्षाकक्ष में और सामाजिक आयोजनों में दलित छात्रों को सवर्ण प्रवासियों द्वारा सामाजिक रूप से अलग-थलग किए जाने की बातें सुनी जा रही हैं।
इस समस्या ने दिखाया है कि जातिगत विभेद केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ विश्व के विभिन्न देशों में भी यह विचारधारा जारी रहती है। दलित छात्र संगठनों और कल्याण समूहों ने इस समस्या को उजागर करते हुए विदेशी विश्वविद्यालयों में समानता और समावेशी संस्कृति स्थापित करने का आह्वान किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति विदेशों में भारतीय समुदाय में सांस्कृतिक और सामाजिक सुधार की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है। दलित अधिकार कार्यकर्ता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि प्रवासी भारतीय समुदायों को अपनी सामाजिक प्रथाओं की समीक्षा करनी चाहिए और सभी के लिए समान सम्मान और अवसर सुनिश्चित करने चाहिए।