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काशी की 483 साल पुरानी रामलीला परंपरा में पहली बार बदलाव
वाराणसी की लाट भैरव रामलीला में मुस्लिम समाज के सदस्य नमाज के लिए नहीं पहुंचे, जिससे सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा में विच्छेद देखने को मिला। आयोजन समिति ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
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वाराणसी की प्रसिद्ध लाट भैरव रामलीला परंपरा में पहली बार विच्छेद देखने को मिला है। इस ऐतिहासिक मंचन के दौरान मगरिब की नमाज पढ़ने के लिए आमंत्रित मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि इस बार उपस्थित नहीं हुए। यह परंपरा 483 वर्षों से निरंतर चली आ रही थी।
रामलीला के आयोजन से जुड़ी समिति ने इस घटना पर निराशा व्यक्त की है। प्रतिवर्ष रामायण की चौपाइयों के पाठ के दौरान परिसर में नमाज अदा करने की यह परंपरा सांप्रदायिक सद्भावना और धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक मानी जाती थी।
काशी की यह परंपरा सदियों से समाज के विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समन्वय का उदाहरण रही है। लाट भैरव रामलीला का यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है।
समिति के अधिकारियों का मानना है कि इस परंपरा को पुनः स्थापित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से संवाद आवश्यक है। वाराणसी की इस अनूठी परंपरा को बरकरार रखना सामाजिक सद्भावना को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।