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बाल अपराधी शब्द परिस्थिति को दर्शाता है, पहचान नहीं: मुख्य न्यायाधीश
भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 'कानून के साथ संघर्ष करने वाला बालक' किसी बच्चे की पहचान नहीं, बल्कि उसकी परिस्थिति को दर्शाता है। उन्होंने जोर दिया कि दस साल का समय किसी कानून के लिए कम हो सकता है, लेकिन यह बचपन का आधे से अधिक समय है।
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भारत के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक प्रणाली में बालकों के साथ व्यवहार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'कानून के साथ संघर्ष करने वाला बालक' यह वर्णन केवल एक परिस्थिति को दर्शाता है, न कि किसी बच्चे की पहचान को। मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर बल दिया कि बालकों को अपराधी के रूप में चिह्नित करना गलत है और उन्हें उनकी परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश का यह बयान किशोर न्याय प्रणाली और बालकों के पुनर्वास पर केंद्रित था। उन्होंने कहा कि दस साल का समय कानूनी दृष्टि से छोटी अवधि मान सकता है, लेकिन बचपन के संदर्भ में यह आधे से अधिक वर्ष होता है। यह कथन बताता है कि किस प्रकार लंबी कानूनी प्रक्रिया एक बच्चे के जीवन को प्रभावित कर सकती है।
मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी किशोर न्याय अधिनियम के तहत बालकों के साथ किए जाने वाले व्यवहार की समीक्षा का हिस्सा प्रतीत होती है। उन्होंने सुधार और पुनर्वास पर जोर देते हुए कहा कि न्यायिक प्रणाली को बालकों को दोषी मानने की बजाय उन्हें सुधारने का प्रयास करना चाहिए। यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है जो बालकों के कल्याण को प्राथमिकता देता है।