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स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में विकासशील देशों का बोझ अधिक: सीजेआई
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते कदमों में देशों की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए और संक्रमण का बोझ न्यायसंगत तरीके से बांटा जाना चाहिए।
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भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में असमान बोझ के मुद्दे को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि विभिन्न राष्ट्रों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में व्यापक अंतर को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के समाधान में एकसमान दृष्टिकोण अपनाना उचित नहीं है।
सीजेआई कांत के विचार के अनुसार, विकसित राष्ट्रों की तुलना में विकासशील देशों को ऊर्जा क्षेत्र में संक्रमण के दौरान कहीं अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। औद्योगीकरण के लिए सीमित संसाधनों और आर्थिक क्षमता के साथ, इन देशों पर तुरंत अपनी ऊर्जा नीति बदलने का दबाव न केवल अव्यावहारिक है बल्कि उनके विकास के अधिकार को भी प्रभावित करता है।
मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर बल दिया कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर वैश्विक संक्रमण को न्यायसंगत और समावेशी तरीके से संपन्न किया जाना चाहिए। इसमें विकसित देशों की ओर से प्रযुक्ति हस्तांतरण, वित्तीय सहायता और विकासशील राष्ट्रों को उनके विशेष परिस्थितियों के अनुरूप समय सीमा देना शामिल होना चाहिए।
इस मुद्दे को उठाकर सीजेआई कांत ने विकासशील देशों, विशेषकर भारत जैसे बड़ी आबादी वाले राष्ट्रों की चिंताओं को न्यायिक मंच पर स्थान दिया है। उनके विचार जलवायु कार्रवाई और सामाजिक-आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने के महत्व को रेखांकित करते हैं।