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स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर छिपी पर्यावरणीय कीमत
लिथियम-आयन बैटरियां नवीकरणीय ऊर्जा क्रांति का आधार हैं, लेकिन इनके खनन और प्रसंस्करण से पर्यावरण और समाज को गंभीर नुकसान हो रहा है। विश्व के तेजी से विद्युतीकरण की इस यात्रा में वास्तविक लागत को समझना महत्वपूर्ण है।
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विश्वभर में विद्युत वाहन और पुनर्नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों की बढ़ती मांग लिथियम-आयन बैटरी तकनीक पर निर्भरता को तेजी से बढ़ा रही है। ये बैटरियां कार्बन-मुक्त ऊर्जा समाधान का प्रतीक मानी जाती हैं, लेकिन इनके उत्पादन के पीछे की वास्तविकता काफी जटिल है। लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसी धातुओं का खनन दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के संवेदनशील क्षेत्रों में किया जाता है।
इन खनन क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन, मिट्टी का प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रति बढ़ती असुरक्षा देखी जा रही है। स्थानीय कृषक समुदाय और आदिवासी जनसंख्या सर्वाधिक प्रभावित हो रही है, जिन्हें अपनी जमीन और जल संसाधनों को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। खनन के बाद इन खनिजों के प्रसंस्करण में भी भारी रासायनिक प्रदूषण उत्पन्न होता है।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए बैटरी तकनीक अपरिहार्य है, लेकिन इसके दौरान अधिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता आवश्यक है। उद्योग और सरकारों को खनन से जुड़े पर्यावरणीय नुकसान को कम करने तथा स्थानीय समुदायों को उचित मुआवजा देने के लिए सख्त मानदंड लागू करने चाहिए। साथ ही, बैटरी पुनर्चक्रण तकनीक में निवेश बढ़ाना होगा ताकि कच्चे माल की नई खनन पर निर्भरता को कम किया जा सके।