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बाल यौन शोषण मामलों में सहमति अप्रासंगिक: केरल उच्च न्यायालय
केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बाल संरक्षण यौन अपराध अधिनियम के तहत सहमति का कोई महत्व नहीं है। अदालत ने इस कानूनी स्थिति को रेखांकित करते हुए एक दोषी की अपील को खारिज किया है।
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केरल उच्च न्यायालय ने बाल यौन शोषण के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बाल संरक्षण यौन अपराध (पीओसीएसओ) अधिनियम, 2012 के तहत किसी भी बच्चे की सहमति अप्रासंगिक और कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
यह निर्णय एक आरोपी की याचिका पर सुनाया गया, जिसने इस अधिनियम के तहत अपने दोषसिद्धि को चुनौती दी था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पीड़ित की सहमति मौजूद थी, परंतु न्यायालय ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
न्यायालय के अनुसार, पीओसीएसओ अधिनियम की मूल भावना बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है। इस कानून के प्रावधानों के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को कानूनी सहमति देने की क्षमता नहीं मानी जाती है, चाहे वे व्यावहारिक रूप से सहमति प्रदान करें या न करें।
यह निर्णय भारत में बाल संरक्षण कानूनों की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण मिसाल है और ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। उच्च न्यायालय का रुख बाल कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।