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अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट समिति को अपर्याप्त जनसंवाद की चिंता
पर्यावरणविदों ने अरावली पहाड़ियों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की समिति को पत्र लिखकर परामर्श प्रक्रिया को व्यापक बनाने की मांग की है। ३१ अगस्त की समय सीमा से पहले विशेषज्ञों का आग्रह है कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आवाजें भी सुनी जाएं।
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अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति पर पर्यावरण संरक्षणकर्ताओं ने जनसंवाद प्रक्रिया को अपर्याप्त बताया है। समिति को दिए गए पत्रों में विशेषज्ञों ने तर्क दिया है कि वर्तमान परामर्श प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सीमित है।
पर्यावरणविदों की मांग है कि समिति को ३१ अगस्त की निर्धारित समय सीमा बढ़ानी चाहिए ताकि सभी हितधारकों से विस्तृत विचार-विमर्श किया जा सके। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों और आदिवासी बहुल क्षेत्रों की आवाजें सुनना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि अरावली का संरक्षण इन समुदायों के जीवन से सीधे जुड़ा है।
संरक्षणकर्ताओं ने समिति से स्वतंत्र विशेषज्ञों को शामिल करने और क्षेत्र के ज्ञानी स्थानीय नागरिकों को फील्ड दौरों में शामिल करने की अपील की है। उनका विचार है कि पहाड़ियों के संरक्षण संबंधी नीतियां तभी प्रभावी हो सकती हैं जब सभी पक्षों की जानकारी और सहमति हो।
अरावली पर्वत श्रृंखला, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली है, वर्षों से खनन और शहरी विकास के दबाव में है। इसके पारिस्थितिक महत्व को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की समिति इसके संरक्षण पर सुझाव दे रही है।