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दिवालियापन कानून में देरी से लेनदारों का धैर्य खत्म हो रहा है
भारतीय दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के तहत लंबी प्रक्रिया से निराश होकर लेनदार अन्य विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। यह रुझान कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठा रहा है।
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भारतीय दिवालियापन संहिता लागू होने के बाद से कर्ज वसूली की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद थी, लेकिन लंबी अदालती कार्यवाही और जटिल प्रक्रियाएं लेनदारों का धैर्य आजमा रही हैं। इसके परिणामस्वरूप, कई लेनदार बाहर निकलकर निजी समझौते, वैकल्पिक विवाद समाधान और अन्य कानूनी मार्गों का सहारा ले रहे हैं।
आईबीसी के तहत दिवालियापन कार्यवाही की अवधि काफी लंबी साबित हुई है, जिससे लेनदारों को अपनी रकम की वसूली में साल-दर-साल इंतजार करना पड़ रहा है। इस बीच, उनकी पूंजी बंधी रहती है और अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ता है। छोटे और मध्यम आकार के लेनदारों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है।
इस प्रवृत्ति के कारण संहिता के मूल उद्देश्य को चोट लग रही है। आईबीसी का विचार असली संकट समाधान और कंपनियों के पुनरुद्धार को गति देना था, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर अदालतों की अधिभार और प्रशासनिक बाधाएं इसे बाधित कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आईबीसी प्रक्रिया में सुधार और समय सीमा को कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो औपचारिक दिवालियापन तंत्र असरदार साबित नहीं हो सकेगा, जिससे भारतीय व्यावसायिक पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।