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अपराध पीड़ित भी तेजी से सुनवाई के लिए अदालत में जा सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि अपराध के शिकार लोग न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए स्वतंत्र रूप से अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें रेणुका जैन की याचिका को खारिज किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अपराध की शिकार व्यक्ति अदालतों से त्वरित सुनवाई की मांग करने का अधिकार रखते हैं। इस फैसले से पीड़ित पक्षों को न्यायिक प्रक्रिया को गतिशील रखने में सक्रिय भूमिका निभाने का रास्ता मिल गया है।
मामले में शामिल रेणुका जैन द्वारा दायर की गई याचिका को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले उन्हें खारिज कर दिया था। इसके साथ ही अदालत ने उन पर 10,000 रुपये का खर्च भी लगाया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश को पलट दिया है।
यह निर्णय अपराध पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब पीड़ित पक्ष न केवल मामले में भागीदार के रूप में बल्कि सक्रिय पक्षकार के रूप में न्याय प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
विधिवेत्ताओं का मानना है कि यह फैसला भारतीय न्यायिक व्यवस्था में पीड़ितों की भूमिका को मजबूत करेगा और अदालतों में लंबित मामलों की सुनवाई तेजी से होने में मदद मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से न्याय पाने की प्रक्रिया में पीड़ितों के अधिकारों की स्वीकृति बढ़ी है।