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किराए की संपत्ति पर लापरवाही महंगी पड़ी, किराएदार को चुकाने पड़े 3 करोड़
दिल्ली हाई कोर्ट के एक मामले में किराएदार को संपत्ति पर लंबे समय तक अनाधिकार कब्जे के लिए मेस्ने प्रॉफिट के रूप में करोड़ों रुपये का भुगतान करना पड़ा। विशेषज्ञ किराया समझौता लिखित रूप में तैयार कराने की सलाह दे रहे हैं।
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दिल्ली हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले में एक किराएदार को संपत्ति पर अवैध कब्जे के कारण तीन करोड़ रुपये से अधिक का मेस्ने प्रॉफिट अदा करना पड़ा है। यह मामला किराया समझौतों के सही तरीके से तैयार न किए जाने के परिणामों को रेखांकित करता है।
मेस्ने प्रॉफिट वह मुआवजा है जो किराएदार को किसी संपत्ति पर कानूनी रूप से अपना अधिकार खोने के बाद भी उस पर रहने के लिए मालिक को देना पड़ता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह राशि अक्सर बकाया किराए से कहीं अधिक होती है।
विधि के जानकारों का कहना है कि किराया समझौता दस्तावेज में स्पष्ट शर्तें, निष्कासन की प्रक्रिया, किराए की अदायगी की विधि और संपत्ति की रखरखाव की जिम्मेदारियां लिखी होनी चाहिए। इसके अभाव में मालिक को काफी कानूनी झंझट झेलने पड़ते हैं।
किराया समझौता तैयार करते समय दोनों पक्षों के हस्ताक्षर, साक्षियों की उपस्थिति और दस्तावेज का पंजीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। कानूनी विशेषज्ञ भी संपत्ति की जांच और किराए की निर्धारित राशि को नियमित अंतराल पर संशोधित करने की सलाह देते हैं। इन सावधानियों से संपत्ति मालिकों को विवादों से बचा जा सकता है।