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भारत में स्पैम संकट: कानून नहीं, बल्कि व्यवस्था में है खामी
भारत की एंटी-स्पैम नीति ट्रैकिंग तो बेहतर कर गई है, लेकिन सहमति का ढांचा अभी भी खामियों से भरा है। दूरसंचार ऑपरेटरों को रीयल-टाइम सत्यापन में मजबूत भूमिका देने से ही जनता का विश्वास बहाल हो सकता है।
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भारत में अवांछित कॉल और संदेशों की समस्या केवल कानून का पालन न होने का मामला नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का असली कारण एंटी-स्पैम नीति के मूल डिजाइन में ही निहित है। वर्तमान ढांचा ट्रेसेबिलिटी में तो सुधार ला पाया है, लेकिन उपयोगकर्ता की सहमति लेने के नियमों में गंभीर खामियां बनी हुई हैं।
ग्राहकों की सहमति जुटाने की प्रक्रिया ऐसी बनी है जो आसानी से दुरुपयोग के लिए खुली है। यह अंतर्निहित दोष है जिसे केवल नियमों को कड़ाई से लागू करने से ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे तंत्र को फिर से तैयार करने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में दूरसंचार ऑपरेटरों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि टेलीकॉम कंपनियों को रीयल-टाइम सत्यापन प्रणाली में अधिक शक्तिशाली भूमिका दी जाए, तो स्पैम को तत्काल रोका जा सकता है। इससे अनाधिकृत संदेशों और कॉलों को तुरंत ब्लॉक करने की क्षमता बढ़ेगी।
ऑपरेटरों को नेटवर्क पर अधिक नियंत्रण देने से न केवल स्पैम कम होगा, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी बहाल होगा। वर्तमान व्यवस्था में सुधार लाना आवश्यक है, क्योंकि यह डिजिटल भारत के विकास में बाधा बन रहा है।