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दिवाली का चेहरा बदला: दिखावे और कर्ज की संस्कृति बढ़ रही है
दिवाली के त्यौहार ने अपना चरित्र बदल दिया है। भक्ति और आस्था के बजाय अब यह दिखावे, वैभव प्रदर्शन और वित्तीय अत्यधिकता का पर्याय बन गया है।
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भारत में दिवाली का पारंपरिक रूप काफी हद तक बदल गया है। आजकल के त्यौहार समारोहों में फोटो के लिए तैयार पूजा-पाठ, भव्य समृद्धि परेड और ऐश्वर्य का प्रदर्शन देखा जाता है। इस बदलाव के साथ ही परिवार और व्यक्ति कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार दिवाली की सामग्री से लेकर उपहार और सजावट तक हर चीज में खर्च बढ़ गया है। महंगे गहने, डिजाइनर कपड़े, विदेशी उपहार और भव्य पार्टियां दिवाली का अभिन्न अंग बन गई हैं। समाज में एक अलिखित प्रतियोगिता देखी जा रही है कि कौन अधिक खर्चीली दिवाली मना सकता है।
इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप मध्यम वर्गीय परिवार अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने के लिए कर्ज लेने लगे हैं। बैंक और गैर-बैंकिंग संस्थाएं त्यौहार के मौसम में विशेष ऋण योजनाएं लाती हैं। इससे पूरे साल आर्थिक दबाव बना रहता है।
दिवाली को फिर से पारंपरिक और सादगीपूर्ण तरीके से मनाने की अपील बढ़ रही है। समाज के विभिन्न वर्गों से यह आवाजें उठ रही हैं कि त्यौहार का असली मतलब सामाजिक रिश्ते-नाते और आध्यात्मिकता होना चाहिए, न कि आर्थिक प्रदर्शन। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए समाज को जागरूक होना पड़ेगा।