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सोशल मीडिया की लत: डूम्सक्रॉलिंग कैसे बर्बाद कर रही है समय
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अनवरत कंटेंट देखने की आदत को डूम्सक्रॉलिंग कहते हैं, जो भारतीय युवाओं की दैनंदिन जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है। नींद, एकाग्रता और उत्पादकता पर इसके गंभीर प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों को चिंता है।
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देशभर के शहरों में स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के साथ एक नई समस्या उभर रही है। रील्स, शॉर्ट वीडियो और अन्य आकर्षक कंटेंट की भीड़ में उपयोगकर्ता घंटों तक स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। इस व्यवहार को डूम्सक्रॉलिंग कहा जाता है, जो लोगों को सोशल मीडिया पर लगातार कंटेंट खपत करने के लिए बाध्य करता है।
जनरेशन जेड के युवा इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित दिख रहे हैं। कई घंटे तक फीड को स्क्रॉल करते रहने से रात की नींद प्रभावित होती है, जिसका असर अगले दिन की कार्यक्षमता पर पड़ता है। एकाग्रता की समस्या भी बढ़ रही है, खासकर तब जब उपयोगकर्ता महत्वपूर्ण कार्यों में ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह व्यवहार एक प्रकार की व्यसन के समान है। एल्गोरिथम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह उपयोगकर्ताओं को लगातार जुड़े रखे। इससे बाहर निकलने के लिए सचेत प्रयास और स्क्रीन समय को सीमित करना आवश्यक है।
विशेषज्ञ सुझाते हैं कि अपने फोन के लिए समय सीमा तय करना, सोने से पहले डिवाइस से दूरी बनाना, और नियमित अवकाश लेना डूम्सक्रॉलिंग की आदत से बाहर आने के प्रभावी तरीके हैं। साथ ही, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक मेलजोल को प्राथमिकता देना भी महत्वपूर्ण है।