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तेजी वाली आर्थिक वृद्धि: विकासशील देशों के लिए संपन्नता की कुंजी
एशिया के देशों ने पिछली शताब्दी में असाधारण आर्थिक वृद्धि दर्ज की है। इस तेजी से विकास ने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है और उन्हें समृद्धि का रास्ता दिखाया है।
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आर्थिक इतिहास साक्ष्य देता है कि द्रुत गति से विकास करने वाले देश ही दीर्घकालीन समृद्धि हासिल कर सके हैं। 1960 के दशक में जापान के नागरिकों की औसत वार्षिक आय मात्र 519 डॉलर थी। उसी समय दक्षिण कोरिया के लोग प्रति वर्ष 159 डॉलर कमाते थे, जो सब-सहारन अफ्रीका के अधिकांश क्षेत्रों से भी कम था। 1978 तक चीन के नागरिकों की औसत वार्षिक आय 157 डॉलर थी।
यह आंकड़े केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सबक प्रदान करते हैं। जब आर्थिक नीतियां दस प्रतिशत या उससे अधिक की वृद्धि दर को प्राथमिकता देती हैं, तो परिणाम नाटकीय होते हैं। दशकों के निरंतर प्रयास के माध्यम से ये एशियाई अर्थव्यवस्थाएं विश्व की सबसे मजबूत और सुसंपन्न अर्थव्यवस्थाओं में तब्दील हो गईं।
यह मॉडल विकासशील देशों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जब राष्ट्र दीर्घकालीन, सुस्थिर वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो वह न केवल राजस्व बढ़ाता है बल्कि रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भी सुनिश्चित करता है। एशिया के अनुभव यह प्रमाणित करते हैं कि आर्थिक गति ही किसी समाज को वास्तविक परिवर्तन की ओर ले जा सकती है।