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चुनाव आयोग में गहरा संकट: आयुक्तों की आपत्तियां, फैसले बिना जानकारी के
दस महीने में चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाताओं की मतदाता सूची से हटाए जाने के मसले में आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं।
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भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की आंतरिक कार्यप्रणाली में गंभीर खामियां सामने आई हैं। विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान दो चुनाव आयुक्तों ने दस महीने की अवधि में 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज की हैं। इन आपत्तियों से पता चलता है कि कई महत्वपूर्ण निर्णय आयुक्तों की जानकारी के बिना ही लिए गए।
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में 27 लाख मतदाताओं को हटाए जाने का मामला इस विवाद का केंद्रीय बिंदु है। फॉर्म 6 विवाद, ईआरओनेट केंद्रीकरण और अन्य प्रशासनिक मुद्दों को लेकर आयोग के भीतर मतभेद स्पष्ट हैं। राज्य के आसन्न चुनावों से पहले यह स्थिति काफी गंभीर मानी जा रही है।
आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता को लेकर ये विवाद चिंता का विषय बन गए हैं। निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक नीति-निर्माण में सभी आयुक्तों की समान भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। मतदाताओं को हटाने के फैसलों की जांच और पारदर्शिता अब जरूरी हो गई है।
इस प्रकार की असहमति जनतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है। देश के सबसे महत्वपूर्ण निर्वाचन संस्थान में ऐसी खामियां लोकतंत्र के लिए चिंताजनक मानी जा रही हैं।