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आर्थिक सुधार 35 साल बाद भी कृषि क्षेत्र से दूर रहे
भारत के आर्थिक उदारीकरण के तीन दशक बाद भी कृषि क्षेत्र संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है। कमजोर बाजार, निवेश की कमी और सब्सिडी पर निर्भरता ने किसानों के विकास को बाधित किया है।
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1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को रूपांतरित किया है, लेकिन देश का कृषि क्षेत्र इन बदलावों से बड़े पैमाने पर अछूता रहा है। तीन दशकों के बाद भी कृषि उद्योग गहरी संरचनात्मक कमजोरियों का सामना कर रहा है जो किसानों की आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं।
कृषि क्षेत्र में निवेश की कमी एक प्रमुख समस्या बनी हुई है। बाजार की अदक्षता और किसानों तक पहुंच की कठिनाइयां उपज को सही मूल्य पर बेचने में बाधा बन रही हैं। इसके अलावा, सरकारी सब्सिडी पर अत्यधिक निर्भरता ने किसानों को आत्मनिर्भर होने से रोका है और दीर्घकालीन सुधारों में बाधा डाली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए व्यापक नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत है। बेहतर बुनियादी ढांचा, उन्नत तकनीक और किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने के प्रयास आवश्यक हैं। हालांकि, सुधार प्रतिरोध और पारंपरिक तरीकों से जुड़ाव इस दिशा में चुनौती बने हुए हैं।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब तक कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव नहीं होंगे, तब तक राष्ट्रीय विकास की गति धीमी रहेगी। किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुधार की प्रक्रिया को तेज करना अत्यंत आवश्यक है।