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विदेशी मुद्रा प्रवाह से तरलता प्रबंधन जटिल होगा: विश्लेषक
बार्कलेज की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रिज़र्व बैंक को आने वाले महीनों में अधिक तरलता सोखने के उपाय करने पड़ सकते हैं। वर्तमान में तरलता अधिशेष आरबीआई के पसंदीदा स्तर से काफी अधिक है।
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विदेशी मुद्रा गैर-निवासी खातों (एफसीएनआर) में आने वाले प्रवाह से भारतीय रिज़र्व बैंक की तरलता प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक को इस स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त उपकरणों का उपयोग करना पड़ सकता है।
बार्कलेज की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा समय में तरलता अधिशेष आरबीआई के अनुकूल स्तर से काफी ऊपर है। आरबीआई का पसंदीदा तरलता स्तर लगभग 2.7 लाख करोड़ रुपये के आसपास माना जाता है।
बैंकिंग विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में केंद्रीय बैंक को रिवर्स रेपो दरों को बढ़ाने, अतिरिक्त नकद निकासी या अन्य बाजार हस्तक्षेप जैसे उपाय अपनाने की आवश्यकता हो सकती है। तरलता में यह अतिरेक मुद्रास्फीति नियंत्रण और मौद्रिक नीति के प्रभावकारी संचालन को बाधित कर सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी निवेशकों के बढ़ते प्रवाह से तरलता प्रबंधन अधिक जटिल होने जा रहा है। आरबीआई को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए अपनी नीतिगत उपकरणों में विविधता लानी पड़ सकती है।