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गुजरात की खेती से विश्व मंच तक गरबा-डांडिया राास की यात्रा

गुजरात की परंपरागत फसल कटाई की रस्मों से जन्मा गरबा और डांडिया राास आज नवरात्रि का वैश्विक प्रतीक बन गया है। इस पारंपरिक नृत्य ने अपनी मूल संस्कृति को बरकरार रखते हुए विविध रूपों में विकास किया है।

LSN India · 21 October 2026

गुजरात की खेती से विश्व मंच तक गरबा-डांडिया राास की यात्रा

गरबा और डांडिया राास की जड़ें गुजरात की प्राचीन खेती-आधारित परंपराओं में गहराई से समाई हुई हैं। ये नृत्य रूप मूलतः फसल कटाई के समय आयोजित होने वाली सामूहिक पूजा और उत्सव का अभिन्न अंग थे। स्थानीय समुदाय इन अवसरों पर देवी दुर्गा की पूजा करते हुए सामूहिक नृत्य-गान का आयोजन किया करते थे।

कालांतर में गरबा और डांडिया राास नवरात्रि समारोह के केंद्रीय आकर्षण के रूप में उभरे। गरबा में महिलाएं एक गोलाकार संरचना के चारों ओर घूमती हुई ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं, जबकि डांडिया राास में प्रतिभागी रंगीन लकड़ियों (डांडिया) को आपस में टकराते हुए नृत्य करते हैं। दोनों नृत्य शैलियां अपनी अलग पहचान बनाए हुए भी एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

गत दशकों में गरबा-डांडिया राास की लोकप्रियता देश की सीमाओं से परे विश्व भर में फैल गई है। प्रवासी भारतीय समुदाय इसे अपने साथ विभिन्न देशों में ले गए, जहां ये नृत्य विभिन्न सांस्कृतिक संदर्भों में अभिव्यक्त होने लगे। आधुनिक नवरात्रि समारोहों में परंपरागत और समकालीन दोनों शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है।

आज गरबा-डांडिया राास केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा है। इसे सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक उत्सव के माध्यम के रूप में देखा जाता है, जो गुजरात की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। नई पीढ़ी इन परंपरागत नृत्य रूपों को अपने तरीके से संरक्षित और पुनर्परिभाषित करते हुए उन्हें जीवंत रख रही है।