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'अर्ध सत्य' फिल्म: पुलिस हिंसा और समाज के विरोधाभास को दर्शाती क्लासिक
गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित 1983 की फिल्म 'अर्ध सत्य' आज भी दर्शकों को असहज करती है। यह फिल्म केवल पुलिस बर्बरता नहीं दिखाती, बल्कि उस हिंसा को समाज में गहराई से जड़ें जमाए हुए दिखाती है।
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गोविंद निहलानी की 1983 की फिल्म 'अर्ध सत्य' समकालीन भारतीय सिनेमा की एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। यह फिल्म पुलिस व्यवस्था के अंतर्विरोधों और कानून लागू करने वाली संस्थाओं की नैतिक जटिलताओं को केंद्र में रखती है।
चार दशक बाद भी इस फिल्म की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। फिल्म की परेशान करने वाली बात यह नहीं है कि वह पुलिस हिंसा को दिखाती है, बल्कि यह है कि वह दिखाती है कि यह हिंसा समाज की संरचना में कितनी गहराई से अंतर्निहित है।
फिल्म का कथानक एक पुलिस अधिकारी के आंतरिक संघर्ष को चित्रित करता है जो कानून और न्याय के बीच की खाई को लेकर द्वंद्व में रहता है। इसके माध्यम से निहलानी पूरी पुलिस प्रणाली और उसके सामाजिक संदर्भों की आलोचनात्मक जांच प्रस्तुत करते हैं।
'अर्ध सत्य' को भारतीय सिनेमा की पैरेलल सिनेमा धारा का एक उदाहरण माना जाता है, जो कला और विचारशील कथन के माध्यम से समाजिक मुद्दों को उजागर करती है। फिल्म आज भी इसलिए प्रासंगिक बनी हुई है क्योंकि इसके उठाए गए प्रश्न भारतीय समाज के लिए अभी भी अनुत्तरित हैं।