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ग्रेहाउंड्स का अंतिम अध्याय: माओवादी युद्ध के बाद क्या भविष्य
1989 में आंध्र प्रदेश के जंगलों में माओवादियों से निपटने के लिए गठित ग्रेहाउंड्स बल तीन दशक बाद एक नए मोड़ पर खड़ा है। विद्रोह की कमजोरी के साथ, इस विशेष प्रतिविद्रोही दल का भविष्य तलाशा जा रहा है।
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1989 में अंडमान प्रदेश के जंगलों में माओवादी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए गठित ग्रेहाउंड्स बल एक अत्याधुनिक प्रतिविद्रोही शक्ति के रूप में उभरा। तीस साल की अवधि में इस विशेषीकृत दल ने अनेक गंभीर संघर्षों का सामना किया और भारी नुकसान झेले हैं, जो माओवादी संघर्ष के विरुद्ध राज्य की कार्रवाइयों का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
इस दल की कार्यप्रणाली और सैन्य रणनीति पूरी अवधि में विद्रोह की गतिविधियों से गहराई से प्रभावित हुई है। ग्रेहाउंड्स के जवानों ने दुर्गम इलाकों में कई सफल अभियान चलाए हैं, लेकिन इन कार्रवाइयों में काफी संख्या में कर्मियों की जानें भी चली गईं। यह विरासत बल के संगठनात्मक संस्कृति और रणनीतिक सोच को लगातार आकार देती रही है।
अब जैसे-जैसे माओवादी विद्रोह की तीव्रता घटती दिख रही है, ग्रेहाउंड्स को अपनी भूमिका और प्रासंगिकता के बारे में गंभीर सवालों का सामना करना पड़ रहा है। सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार, बल को पारंपरिक आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से परे नई चुनौतियों के लिए तैयार होना होगा। माओवादी संघर्ष की कमजोरी के इस दौर में ग्रेहाउंड्स की विशेषज्ञता को अन्य क्षेत्रों में कैसे लागू किया जाए, यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है जो आने वाले समय में तय होना बाकी है।