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गुजरात के प्रोफेसर ने विश्वविद्यालय परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध की मांग की
एक वरिष्ठ संकाय सदस्य ने सरकारी विश्वविद्यालय में सभी धार्मिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा है। उन्होंने भारतीय संविधान के मूल ढांचे में धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करने वाले 1973 के केसवानंद भारती फैसले का हवाला दिया है।
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गुजरात के एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् ने राज्य द्वारा वित्तपोषित विश्वविद्यालय परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों के निषेध की मांग की है। इस प्रस्ताव के पीछे उनका तर्क भारतीय संविधान के मौलिक सिद्धांतों पर केंद्रीभूत है।
प्रोफेसर ने अपनी स्थिति को समर्थन देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 1973 के केसवानंद भारती फैसले का संदर्भ दिया है। इस ऐतिहासिक निर्णय में धर्मनिरपेक्षता को भारतीय संविधान के मूल ढांचे का एक अभिन्न अंग माना गया था। शिक्षाविद् का मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों को इस सिद्धांत का कड़ाई से पालन करना चाहिए।
विश्वविद्यालय परिसर में धार्मिक गतिविधियों के नियमन को लेकर यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। शिक्षा संस्थानों में धर्मनिरपेक्षता के संरक्षण और धार्मिक स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाए रखने का प्रश्न भारतीय उच्च शिक्षा में लंबे समय से चला आ रहा है।
इस सुझाव से शैक्षणिक समुदाय में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है। विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए संवैधानिक सिद्धांतों और छात्रों की सांस्कृतिक आवश्यकताओं के बीच उचित संतुलन खोजना एक जटिल चुनौती बनी हुई है।