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एशिया का जल भंडार सालाना 24 अरब टन भूजल खो रहा है
उच्च पर्वतीय एशिया के भूजल भंडार जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक मानवीय उपयोग के कारण गंभीर रूप से क्षीण हो रहे हैं। नई शोध से पता चलता है कि यदि वर्तमान खपत के रुझान जारी रहे तो भूजल संकट और गहरा होगा।
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एशिया के उच्च पर्वतीय क्षेत्र को अक्सर विश्व का 'जल मीनार' कहा जाता है, लेकिन नवीनतम शोध से चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। इन क्षेत्रों के भूजल भंडार प्रतिवर्ष 24 अरब टन की गति से क्षीण हो रहे हैं। यह क्षरण जलवायु प्रभावों और अत्यधिक मानवीय जल उपयोग के संयुक्त परिणाम है।
सिंचाई की बढ़ती मांग विशेषकर निचली घाटियों में भूजल संकट को और तीव्र बना रही है। कृषि और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है, जिससे भूजल भंडार में तेजी से गिरावट आ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वर्तमान खपत की दर बनी रहती है तो भूजल संकट और गहराता जाएगा।
हिमनद पिघलने से अल्पकालीन राहत मिल सकती है, लेकिन यह अस्थायी समाधान है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर सिकुड़ते जाएंगे, जलप्रवाह में तेजी से कमी आएगी। विशेषज्ञ इसे एक गंभीर चेतावनी मान रहे हैं जो इस क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए संकट पैदा कर सकती है।
भूजल संरक्षण और स्थायी जल प्रबंधन के उपायों की तुरंत आवश्यकता है ताकि भविष्य में पानी के संकट से बचा जा सके।