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अंतिम संस्कार में शव को बांधने की परंपरा: धार्मिक और व्यावहारिक महत्व

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद शव को अर्थी पर बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गरुड़ पुराण और प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, यह परंपरा केवल व्यावहारिक नहीं बल्कि गहरे धार्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ से जुड़ी है।

LSN India · 1 October 2026

अंतिम संस्कार में शव को बांधने की परंपरा: धार्मिक और व्यावहारिक महत्व

हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कई धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी है। इन परंपराओं में से एक महत्वपूर्ण रीति-रिवाज है शव को अर्थी पर रस्सियों से बांधना। यह प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही है और इसके पीछे कई तर्क छिपे हैं।

गरुड़ पुराण जैसे प्राचीन धर्मशास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा शरीर को त्याग देती है, लेकिन शरीर अभी भी अपने अंतिम यात्रा के दौरान सुरक्षित रहना चाहिए। शव को बांधना इस बात का प्रतीक है कि आत्मा को शरीर से पूरी तरह मुक्त किया जा रहा है। साथ ही, यह कर्म और पुनर्जन्म के चक्र से संबंध तोड़ने का संकेत भी माना जाता है।

व्यावहारिक दृष्टिकोण से, अंतिम यात्रा के दौरान शव को अर्थी पर सुरक्षित रखने के लिए बांधना आवश्यक है ताकि शव स्थिर रहे और श्मशान तक पहुंचने में कोई समस्या न आए। यह परंपरा सुरक्षा और सम्मान दोनों सुनिश्चित करती है।

धार्मिक ग्रंथों में माना गया है कि शव को बांधने की यह प्रक्रिया आत्मा की शांति और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है। इसके अलावा, यह परिवार के सदस्यों के लिए एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक कदम भी है, जो उन्हें यह स्वीकार करने में मदद करता है कि मृतक की भौतिक यात्रा समाप्त हो रही है।