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तेरहवीं के बाद शोक: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोक्ष में बाधा डालने वाली गलतियां

हिंदू परंपरा में तेरहवीं तक मृतक के लिए शोक मनाना उचित माना जाता है, लेकिन इसके बाद भी दीर्घकालीन विलाप आत्मा की आगामी यात्रा में बाधा उत्पन्न कर सकता है। धार्मिक ज्ञान के अनुसार इससे बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं।

LSN India · 10 October 2026

तेरहवीं के बाद शोक: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोक्ष में बाधा डालने वाली गलतियां

भारतीय धार्मिक परंपराओं में मृत्यु के बाद तेरहवीं का महत्व विशेष माना जाता है। इस अवधि में परिवार के सदस्य और निकटजन मृतक के लिए उचित शोक-संतप्त होते हैं, जिसे धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य माना जाता है। तेरहवीं के पश्चात् परिवार को जीवन की सामान्य गतिविधियों में लौटना चाहिए।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तेरहवीं के बाद भी यदि परिवार के सदस्य निरंतर विलाप करते रहते हैं और मृतक को स्मृतियों में बार-बार जीवित करते हैं, तो इससे आत्मा की आगे की यात्रा में बाधा उत्पन्न होती है। वर्षों तक मृतक की तस्वीर के समक्ष दीपक जलाना और निरंतर विषाद की स्थिति में रहना आत्मा को मुक्ति प्राप्त करने में सहायक नहीं माना जाता है।

धार्मिक ज्ञान के अनुसार, तेरहवीं के बाद मोक्ष में बाधा लाने वाली तीन मुख्य गलतियां हैं: दीर्घकालीन विलाप और रुदन, मृतक की तस्वीरों के सामने लगातार अनुष्ठान करना, तथा मृतक को लेकर नकारात्मक विचार बनाए रखना। इन्हीं कारणों से आत्मा अपनी नई यात्रा में अवरुद्ध हो जाती है।

विद्वानों के अनुसार, तेरहवीं के पश्चात् परिवार को सकारात्मक स्मृतियों के साथ आगे बढ़ना चाहिए और मृतक के लिए प्रार्थना और आशीर्वाद देते हुए उसे विदा करना चाहिए। इसे आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक माना जाता है।