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कलयुग के अंत को लेकर धार्मिक ग्रंथों में क्या है भविष्यवाणी
वैश्विक संकट और प्राकृतिक आपदाओं के बीच हिंदू धर्मग्रंथों में कलयुग के समापन को लेकर की गई भविष्यवाणियां फिर से चर्चा में आई हैं। श्रीमद्भागवत पुराण और भविष्यमालिका के अनुसार इस काल की विशेषताएं क्या बताई गई हैं, यह जानना महत्वपूर्ण है।
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हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार कलयुग को अधर्म, संकट और नैतिक पतन का युग माना जाता है। दुनिया भर में चल रहे सशस्त्र संघर्षों, बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं और सामाजिक विषमता को देखते हुए कई विद्वान प्राचीन भविष्यवाणियों की ओर ध्यान दे रहे हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण में कलयुग की विशेषताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुराण के अनुसार इस काल में सत्य का ह्रास, झूठ की वृद्धि, धर्मभीरुता में कमी और मानवीय मूल्यों का क्षरण होता है। साथ ही, इस अवधि में प्रकृति के कोप में वृद्धि देखी जाती है।
भविष्यमालिका में भी समकालीन युग की कई विशेषताओं का उल्लेख मिलता है जो वर्तमान परिस्थितियों से मेल खाती प्रतीत होती हैं। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि कलयुग की अवधि 4,32,000 वर्षों की होती है और वर्तमान में हम इसके केवल 5,000 वर्षों को पार कर चुके हैं।
तथापि, विभिन्न धार्मिक परंपराओं के अनुसार यह युग अभी काफी समय तक जारी रहेगा। धार्मिक ग्रंथ और आधुनिक समाज दोनों के बीच सामंजस्य समझने के लिए विद्वानों का कहना है कि मानवीय कर्मों और नैतिकता में सुधार ही इस संकट काल से बाहर निकलने का मार्ग है।