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बकिंघम नहर फिर से बनी चर्चा का विषय, भारत के पूर्वी तट पर 450 किमी का विस्तार
भारत के पूर्वी तट के साथ-साथ 450 किलोमीटर तक फैली बकिंघम नहर एक बार पूरी तरह नौकायन योग्य जलमार्ग का हिस्सा थी। कृष्णा और गोदावरी सिंचाई नहर प्रणालियों के साथ यह मिलकर लगभग 650 किलोमीटर का निरंतर व्यवहारिक मार्ग बनाती थी।
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दक्षिण भारत की ऐतिहासिक जलीय संरचना बकिंघम नहर फिर से विकास परियोजनाओं और नवीनीकरण योजनाओं के केंद्र में है। यह नहर आंध्र प्रदेश में 250 किलोमीटर और तमिलनाडु में 200 किलोमीटर तक विस्तृत है, जो भारत के पूर्वी तट पर कुल 450 किलोमीटर की दूरी को कवर करती है।
ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से, बकिंघम नहर कृष्णा और गोदावरी नदियों की सिंचाई नहर प्रणालियों के साथ जुड़कर एक विशाल जल परिवहन नेटवर्क का निर्माण करती थी। इस संयुक्त व्यवस्था से कुल मिलाकर लगभग 650 किलोमीटर की निरंतर नौकायन योग्य पट्टी बनती थी, जो व्यापार और कृषि के लिए महत्वपूर्ण थी।
काल के साथ, इस नहर प्रणाली की सक्रिय उपयोगिता में गिरावट आई है। वर्तमान समय में बकिंघम नहर को पुनः विकसित करने की दिशा में विभिन्न हितधारकों का ध्यान केंद्रित हो रहा है। इसका उद्देश्य न केवल ऐतिहासिक संरचना को संरक्षित रखना है, बल्कि आधुनिक परिवहन और सिंचाई आवश्यकताओं को भी पूरा करना है।
क्षेत्रीय विकास के दृष्टिकोण से, इस नहर का पुनरुद्धार आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जल संसाधन प्रबंधन और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए इसके विकास की रूपरेखा तैयार की जा रही है।