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न्यूजीलैंड में 1867 में छोड़ी गई गौरैयों को 15 साल बाद जहरीला अनाज खिलाया गया
न्यूजीलैंड ने 1867 में यूरोपीय गौरैयों को कीट नियंत्रण के लिए पेश किया था, लेकिन ये पक्षी तेजी से बढ़ गए और किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बन गए। अनियंत्रित प्रजनन के कारण सरकार को नियंत्रण के उपायों का सहारा लेना पड़ा।
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न्यूजीलैंड के किसानों की मदद के लिए एक बार जो जैविक नियंत्रण का तरीका अपनाया गया था, वह 15 साल बाद एक गंभीर पारिस्थितिक समस्या में बदल गया। 1867 में कैंटरबरी क्षेत्र में 40 गौरैयां छोड़ी गई थीं, ताकि ये फसलों को नष्ट करने वाली कीटों को खा सकें। प्रारंभ में यह योजना सफल प्रतीत हुई, लेकिन ये पक्षी तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगे।
गौरैयों की आबादी में हुई इस विस्फोटक वृद्धि से न्यूजीलैंड के कृषि क्षेत्र में गंभीर नुकसान होने लगा। ये पक्षी अनाज, फल और विभिन्न फसलों, विशेषकर गेहूं, जौ और मक्का को खाकर बर्बाद करने लगे। जो समाधान माना जाता था, वही अब एक बड़ी पारिस्थितिक चुनौती बन गया।
इस समस्या का समाधान करने के लिए न्यूजीलैंड की सरकार को कड़े कदम उठाने पड़े। गौरैयों को नियंत्रित करने के लिए जहरीला अनाज, गोलीबारी और अंडों तथा सिर के लिए इनाम की घोषणा जैसे संगठित प्रयास किए गए। यह घटना यूरोपीय पक्षियों को कृषि और भावनात्मक कारणों से पेश करने के व्यापक अभियान का एक हिस्सा थी।
इस अनुभव ने प्रकृति के साथ मानवीय हस्तक्षेप के खतरों के बारे में महत्वपूर्ण सबक सिखाया। विदेशी प्रजातियों का परिचय देते समय उनके दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभावों को ध्यान में रखना कितना जरूरी है, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया।