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पेरिस समझौता: 10 साल बाद भारत की कार्बन उत्सर्जन में स्थिति
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं ने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के बीच सीधा संबंध स्पष्ट किया है। भारत शीर्ष तीन उत्सर्जक देशों में से एक है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में अमेरिका और चीन से कहीं आगे है।
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पेरिस जलवायु समझौते के एक दशक बाद विश्व समुदाय की प्रतिबद्धता की परीक्षा चल रही है। हाल की प्राकृतिक आपदाओं ने जलवायु परिवर्तन और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के बीच सीधे संबंध को रेखांकित किया है। 2025 के वैश्विक कार्बन बजट के अनुमान से संकेत मिलता है कि जीवाश्म ईंधन से होने वाला उत्सर्जन अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचने वाला है।
भारत वर्तमान में विश्व के शीर्ष तीन कार्बन उत्सर्जक देशों में स्थान रखता है। हालांकि, प्रति व्यक्ति के आधार पर भारत का उत्सर्जन मानदंड अमेरिका और चीन जैसे बड़े औद्योगिक देशों की तुलना में काफी कम है। यह भारत की विशाल जनसंख्या और विकास संबंधी चुनौतियों को देखते हुए एक महत्वपूर्ण अंतर है।
विकसित और विकासशील देशों के बीच उत्सर्जन में यह असमानता जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक रणनीति में एक प्रमुख मुद्दा बनी हुई है। पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक देश को अपनी विकास आवश्यकताओं के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को संतुलित करना होगा। भारत जैसे उभरते अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह संतुलन विशेष रूप से जटिल है।