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भारत के समुद्री मत्स्य संसाधनों को आर्थिक मूल्य देने का प्रयोग
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने समुद्री मछली के भंडार का मौद्रिक मूल्य निर्धारित करने के लिए एक नई पद्धति का सुझाव दिया है। इस विधि में भविष्य की संभावित आय, संसाधन की स्थिरता और उसके उपयोगी जीवनकाल को ध्यान में रखा जाएगा।
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भारत के समुद्री मत्स्य संसाधनों को आर्थिक दृष्टिकोण से मापने के लिए सरकार ने एक प्रायोगिक पद्धति को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से प्रस्तावित इस तरीके में भविष्य में मछली पालन से प्राप्त होने वाली आय को आधार बनाया जाएगा।
इस नई पद्धति के अंतर्गत समुद्री मत्स्य भंडार का मूल्य निर्धारित करते समय दो मुख्य कारकों पर विचार किया जाएगा। पहला, संसाधन की दीर्घकालीन स्थिरता यानी कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मछलियों का शिकार टिकाऊ तरीके से हो। दूसरा, संसाधन का उपयोगी जीवनकाल अर्थात कितने समय तक इन मछलियों का दोहन किया जा सकता है।
यह प्रायोगिक तरीका देश की राष्ट्रीय संपत्ति के हिसाब में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। समुद्री संसाधनों को आर्थिक रूप से मापने से पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकेगी। इससे मत्स्य पालन नीति निर्माण में भी अधिक सटीकता आ सकेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पद्धति से भारत की समुद्री संपत्ति का सही मूल्य प्रतिबिंबित हो सकेगा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन संसाधनों के संरक्षण में भी योगदान मिल सकता है।