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हिमालय संकट के बीच ग्लेशियर अनुसंधान केंद्रों के बंद होने पर सवाल
हिमालय के बर्फ और बर्फानी पहाड़ों से आने वाले जल पर अरबों लोग निर्भर हैं, लेकिन तेजी से बदलते जलवायु खतरों के प्रति उनका एक्सपोजर बढ़ रहा है।
LSN India ·
हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर अनुसंधान सुविधाओं को बंद करने की नीति को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में जलवायु विज्ञानियों और नीति निर्माताओं का मानना है कि इस समय अनुसंधान केंद्रों को मजबूत करना महत्वपूर्ण है, न कि उन्हें कमजोर करना।
हिमालय की बर्फ और हिमनद भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित क्षेत्र के देशों के लिए मीठे पानी का प्रमुख स्रोत हैं। इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोग कृषि, पेयजल और जलविद्युत ऊर्जा के लिए हिमालयी जल संसाधनों पर निर्भर हैं। यह नेटवर्क एशिया की सबसे महत्वपूर्ण जल प्रणालियों में से एक है।
हालांकि, तेजी से जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। इसके साथ ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) और भूस्खलन जैसे खतरों में भी वृद्धि देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन आसन्न जोखिमों को समझने और उन्हें कम करने के लिए निरंतर अनुसंधान की आवश्यकता है।
क्षेत्रीय वैज्ञानिक समुदाय का तर्क है कि अनुसंधान सुविधाओं को बंद करने से ग्लेशियर परिवर्तन की निगरानी क्षमता कमजोर हो जाएगी। इससे जलवायु संकट और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारी में बाधा आएगी।