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बाल विवाह में कमी के बावजूद भारत में लाखों लड़कियां खतरे में
भारत में बाल विवाह की दर में गिरावट आई है, लेकिन विश्व स्तर पर हर तीसरी बाल दुल्हन भारतीय है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि कुछ राज्यों में समस्या गंभीर बनी हुई है।
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भारत में बाल विवाह की प्रथा में तो कमी आई है, लेकिन यह समस्या अभी भी विकराल है। राष्ट्रीय औसत के आधार पर संतुष्ट होने की चेतावनी विशेषज्ञ दे रहे हैं। बाल विवाह का प्रचलन 1996 में 50 प्रतिशत से घटकर अब 20 प्रतिशत रह गया है, लेकिन पांच राज्य - उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश - देश के कुल बाल विवाहों के आधे से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं।
यूनिसेफ और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर पांच में से एक युवा महिला 18 साल की उम्र से पहले विवाह में बंध जाती है। विश्व स्तर पर बाल दुल्हनों में भारत का हिस्सा एक तिहाई है। अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाया है।
दक्षिण के कुछ राज्य इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। केरल और लक्षद्वीप ने बाल विवाह में उल्लेखनीय कमी हासिल की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन राज्यों के उदाहरण से अन्य क्षेत्रों को सीख मिल सकती है।
2030 तक बाल विवाह को समाप्त करने के वैश्विक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, विशेषज्ञों का मानना है कि लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य में निरंतर निवेश आवश्यक है। इसके अलावा, किशोरावस्था के दौरान लड़कियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी ताकि वह स्कूल में बनी रहें और स्वस्थ जीवन जी सकें।