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भारतीय हवाईअड्डों में एकाधिकार नियंत्रण के लिए नियमन जरूरी
भारतीय हवाईअड्डा क्षेत्र में एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने के लिए अकेले अनुबंध सीमा काफी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत नियामकीय ढांचे की आवश्यकता है।
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भारत के प्रमुख हवाईअड्डों में प्रतिस्पर्धा की कमी को लेकर उठाई जा रही चिंताओं पर नई बहस शुरू हुई है। विमानन क्षेत्र में विश्लेषकों और नीति निर्माताओं का कहना है कि एयरलाइन ऑपरेटरों के लिए अनुबंध की अवधि में सीमा लगाना समस्या का केवल आंशिक समाधान है।
वर्तमान में भारतीय हवाईअड्डा क्षेत्र में कुछ प्रमुख खिलाड़ियों का वर्चस्व देखा जा रहा है, जिससे सेवाओं की कीमतें और शर्तें सीमित होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अनुबंध अवधि में कटौती करने से हालांकि कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए अपर्याप्त है।
नियामक सुधारों की मांग बढ़ रही है जो हवाईअड्डा सेवाओं में स्वच्छता और पारदर्शिता लाएं। विश्लेषकों का मत है कि सख्त मूल्य निर्धारण दिशानिर्देश, सेवा मानकों में कड़ाई और नई प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के प्रवेश में सुविधा देना अपेक्षित है।
हवाईअड्डा ऑपरेटर्स के लिए सेवा प्रदाता चुनने की प्रक्रिया को भी अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि व्यापक नियामकीय सुधार ही भारतीय विमानन अवसंरचना को अधिक प्रतिस्पर्धी और दक्ष बना सकते हैं।