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विकसित भारत के लिए बैंकिंग: सफाई तो हुई लेकिन सुधार अधूरे
देश की बैंकिंग व्यवस्था की सफाई का महंगा अभियान पूरा हो गया है, लेकिन इसमें जवाबदेही का अभाव रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि विकसित भारत के निर्माण के लिए गहरे संरचनागत सुधार की जरूरत है।
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भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में हाल के वर्षों में किए गए सुधार कार्यों का मूल्यांकन करने से पता चलता है कि हालांकि सतही स्तर पर सफाई का काम पूरा हो गया है, लेकिन यह प्रक्रिया अत्यंत महंगी साबित हुई है।
बैड लोन्स को निपटाने और बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने के नाम पर किए गए उपायों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी देखी गई है। जिन्हें इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार माना जाता था, उनके विरुद्ध पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।
विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल मौजूदा समस्याओं को दूर करना काफी नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र में आंतरिक नियंत्रण, नैतिक मानदंड और कर्पोरेट प्रशासन में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
इन मौलिक सुधारों के बिना बैंकिंग व्यवस्था भविष्य में फिर से ऐसी समस्याओं का सामना कर सकती है। इसलिए सरकार और नियामक प्राधिकारियों को संरचनागत सुधार की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।