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भारत का कार्बन विरोधाभास: बड़ा उत्सर्जक लेकिन प्रति व्यक्ति कम पदचिह्न
भारत के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 1990 के बाद से सालाना 3.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है, जो वैश्विक दर के दोगुने से अधिक है। हालांकि, प्रति व्यक्ति आधार पर भारत की कार्बन पदचिह्न विश्व औसत से काफी कम बनी हुई है।
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भारत की ऊर्जा और औद्योगिक आवश्यकताएं तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। पिछले तीन दशकों में 3.6 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर विश्व की औसत 1.5 प्रतिशत दर से दोगुनी रही है। यह वृद्धि मुख्य रूप से भारत की तीव्र आर्थिक विकास, बढ़ती आबादी और बढ़ती ऊर्जा मांग से जुड़ी है।
हालांकि, भारत अपने विशाल जनसंख्या आधार के कारण एक महत्वपूर्ण कार्बन विरोधाभास का सामना कर रहा है। प्रति व्यक्ति के आधार पर भारत का कार्बन पदचिह्न विकसित देशों और वैश्विक औसत दोनों से कहीं कम है। यह स्थिति भारत की ऊर्जा दक्षता में सुधार और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भारत की जलवायु नीति और ऊर्जा रणनीति इसी द्वैध चुनौती का सामना करने का प्रयास कर रही है। देश ने अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और ऊर्जा दक्षता में सुधार की प्रतिश्रुति दी है। साथ ही, भारत विकासशील देश के रूप में अपने विकास के अधिकार को भी बनाए रखना चाहता है, जहां प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अभी भी अपेक्षाकृत कम है।