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भारत में इक्विटी दीर्घकालीन पूंजी लाभ कर: दो दशक की नीति यात्रा
भारत की इक्विटी दीर्घकालीन पूंजी लाभ (एलटीसीजी) नीति में 2003 से लेकर आज तक कई महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। अस्थायी छूट से लेकर पूर्ण कर मुक्ति और फिर 2018 में इसकी वापसी के बाद अब सुधार की नई मांगें उठ रही हैं।
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भारत की शेयर बाजार कर नीति का सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2003 में शुरुआत करते हुए सरकार ने इक्विटी दीर्घकालीन पूंजी लाभ पर अस्थायी छूट दी थी, जिसे अगले वर्ष पूर्ण कर मुक्ति में तब्दील कर दिया गया। यह निर्णय शेयर बाजार में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए लिया गया था।
2004 से 2018 तक करीब डेढ़ दशक तक इक्विटी में लंबी अवधि के निवेश पर कोई कर नहीं लगता था। इस अवधि में भारतीय शेयर बाजार में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई और खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ी। यह नीति भारत की पूंजी बाजार विकास रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई थी।
हालांकि, 2018 में सरकार ने एक बड़ा नीतिगत मोड़ लाया और इक्विटी एलटीसीजी पर फिर से कर लगाया। इस निर्णय को राजस्व संग्रहण के लिए आवश्यक माना गया, किंतु निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच यह विवादास्पद रहा। नई कर दर शुरुआत में निवेश पैटर्न को प्रभावित करने वाली मानी गई।
वर्तमान समय में नीति सुधार की मांग फिर से मजबूत हो गई है। विभिन्न हितधारक और विश्लेषक तर्क दे रहे हैं कि घरेलू पूंजी बाजार को मजबूत करने के लिए इक्विटी निवेश को अधिक प्रोत्साहन देना चाहिए। आने वाले समय में इस कर नीति में किस दिशा में परिवर्तन होता है, यह भारत की आर्थिक नीति का एक अहम सवाल बना हुआ है।