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1991 के सुधारों ने भारतीय फैशन को बदला, पर वैश्विक ब्रांड नहीं बना सके

आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत में अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांडों की बाढ़ आ गई। हालांकि, देश अपना विश्वस्तरीय फैशन ब्रांड तैयार करने में विफल रहा।

LSN India · 4 October 2026

1991 के सुधारों ने भारतीय फैशन को बदला, पर वैश्विक ब्रांड नहीं बना सके

1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय फैशन जगत को पूरी तरह बदल दिया। उदारीकरण की नीतियों के साथ ही विदेशी फैशन ब्रांड भारतीय बाजार में आने लगे। इससे शहरी भारतीय उपभोक्ताओं के पास अब विश्वस्तरीय अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों को खरीदने का विकल्प मिल गया। लुइ वित्तों से लेकर प्रादा तक सभी प्रमुख विलासिता ब्रांड भारत में अपनी दुकानें खोलने लगे।

इस आयातित समृद्धि के बावजूद, भारत के फैशन उद्योग ने अपना कोई विश्वस्तरीय ब्रांड तैयार नहीं कर पाया जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैसा ही प्रभाव डाल सके। जहां जापान ने अनिमे से शुरू कर फैशन में अपनी पहचान बनाई, वहीं भारत मूलतः विदेशी ब्रांडों को बेचने का माध्यम बन गया। घरेलू फैशन डिजाइनर भले ही घरेलू बाजार में कामयाब रहे हों, किंतु उन्हें वैश्विक मंच पर वह सफलता नहीं मिली जो विदेशी ब्रांडों को मिली।

विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के आगमन ने भारतीय फैशन उद्योग की स्वदेशी क्षमता को कमजोर किया। बड़े पूंजी निवेश, बेहतर विपणन और वैश्विक नेटवर्क की कमी के कारण भारतीय डिजाइनर अपने ब्रांड को विश्व मंच तक नहीं ले जा सके। नतीजतन, भारतीय फैशन उद्योग आज भी विदेशी ब्रांडों की वितरक के रूप में ही ज्यादातर काम करता है।