Business · India Bureau
डेटा की मात्रा नहीं, गुणवत्ता का मायने है आर्थिक संकेतकों में
मुंबई प्रतिदिन नई दिल्ली की तुलना में कहीं अधिक डेटा उत्पन्न करता है, लेकिन सेंसेक्स के समापन मूल्य में कभी संशोधन नहीं होता। यह सवाल उठाता है कि आर्थिक संकेतकों की विश्वसनीयता डेटा की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी पद्धति पर निर्भर करती है।
LSN India ·

देश की आर्थिक गतिविधियों को मापने के लिए उपयोग किए जाने वाले संकेतकों की विश्वसनीयता को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया है। जहां मुंबई जैसे वित्तीय केंद्र प्रतिदिन विशाल मात्रा में डेटा उत्पन्न करते हैं, वहीं आर्थिक सूचकांकों की गणना में इस पर्याप्त सूचना का पूरी तरह उपयोग नहीं होता है।
सेंसेक्स जैसे प्रमुख शेयर सूचकांकों की गणना प्रक्रिया में एक बार अंतिम मूल्य घोषित होने के बाद उसे संशोधित नहीं किया जाता, भले ही बाद में अतिरिक्त या सुधारे हुए डेटा उपलब्ध हो जाएं। यह दृष्टिकोण बाजार की तात्कालिकता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाता है।
हालांकि, राष्ट्रीय सकल घेलू उत्पाद जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतकों में नियमित संशोधन की प्रथा है। सांख्यिकीय डेटा की गुणवत्ता और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए ये संशोधन आवश्यक माने जाते हैं। यह दोहरी प्रणाली दर्शाती है कि विभिन्न आर्थिक संकेतकों के लिए अलग-अलग पद्धतिगत दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बड़ी मात्रा में डेटा उपलब्ध होने के बाद भी, यदि उसे सही तरीके से संकलित, सत्यापित और प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो आर्थिक निर्णय गलत हो सकते हैं। इसलिए डेटा की मात्रा के बजाय उसकी पद्धति और विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।