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भारत का हरित हाइड्रोजन मिशन महंगाई और धीमी प्रगति से जूझ रहा है
भारत के हरित हाइड्रोजन मिशन को लॉन्च किए चार साल बाद भी परियोजनाओं को ज़मीन पर उतारने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस पहल की सफलता के लिए दीर्घकालीन खरीद समझौते और अनिवार्य मांग आवश्यक हैं।
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भारत के महत्वाकांक्षी हरित हाइड्रोजन मिशन को व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि परियोजनाओं को कार्यान्वित करने की गति धीमी रही है और लागत संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। मिशन के लॉन्च के लगभग चार वर्षों में भी कई परियोजनाएं ठीक से आगे नहीं बढ़ पाई हैं, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषकों के अनुसार, हरित हाइड्रोजन उत्पादन की उच्च लागत परियोजनाओं के लिए प्रमुख बाधा बनी हुई है। इसके अलावा, बाजार में पर्याप्त मांग न होने से भी निवेशकों में अनिश्चितता की स्थिति है। ये दोनों कारक मिलकर परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने में बाधा डाल रहे हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए विशेषज्ञ सरकार से दीर्घकालीन खरीद समझौते और अनिवार्य खरीद मानदंड लागू करने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे कदम से न केवल निवेशकों को आश्वस्त किया जा सकेगा, बल्कि हरित हाइड्रोजन के लिए स्थिर बाजार भी विकसित हो सकेगा।
उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार द्वारा मांग की गारंटी दी जाए और स्पष्ट नीतिगत रूपरेखा प्रदान की जाए, तो भारत के हरित हाइड्रोजन क्षेत्र को तेजी से विकसित होने का अवसर मिल सकता है। इसके लिए जल्द ही कार्यकारी कदम उठाने की आवश्यकता है।