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इल नीनो को अकेले दोष न दें: मानसून घाटे के पीछे अन्य कारण भी
इस साल की दक्षिण-पश्चिम मानसून 13 प्रतिशत की कमी के साथ समाप्त हुई है। विशेषज्ञ सतर्क हैं कि 'गोडजिला' इल नीनो का पूरा प्रभाव अभी बाकी है।
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भारत की कृषि और जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष दीर्घकालीन औसत से 13 प्रतिशत की कमी के साथ समाप्त हुआ है। यह स्थिति देश को चिंतित कर रही है, लेकिन मौसम विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि सूखे के लिए सिर्फ इल नीनो जिम्मेदार नहीं है।
दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के मौसम पर गहरा प्रभाव डालने वाली इल नीनो घटना इस बार असामान्य रूप से प्रबल है। विशेषज्ञों ने इसे 'सुपर' या 'गोडजिला' इल नीनो का नाम दिया है। हालांकि, भारतीय मानसून के कमजोर प्रदर्शन के पीछे जलवायु परिवर्तन, स्थानीय तापमान में वृद्धि और अन्य भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
भारत के लिए मानसून वर्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की कृषि और जल संसाधन इस पर बड़ी हद तक निर्भर हैं। मौजूदा स्थिति में कृषकों और नीति निर्माताओं को बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, केवल अंतर्राष्ट्रीय जलवायु घटनाओं को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
आने वाले महीनों में इल नीनो के पूर्ण प्रभाव को लेकर विशेषज्ञ सतर्क हैं। सरकार और संबंधित एजेंसियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और फसल योजना में तुरंत कदम उठाएं ताकि संभावित कृषि संकट से बचा जा सके।